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| स्वास्तिक चिन्ह |
स्वास्तिक चिन्ह बनाने का सही तरीका
हिंदू धर्म में स्वास्तिक को शक्ति सौभाग्य समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है घर में अगर किसी भी प्रकार का वास्तु दोष होता है तो उसे ठीक करने के लिए स्वस्तिक चिन्ह का भी प्रयोग किया जाता है स्वास्तिक चिन्ह के प्रयोग से घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है और सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है जिससे घर के सभी बिगड़े हुए काम तेजी से बढ़ने लगते हैं । अब हम ‘स्वास्तिक चिन्ह कैसे बनाया जाता है? ‘सही तरीके से स्वास्तिक चिन्ह कैसे बनाते हैं? ‘इसको बनाने का सही तरीका क्या है? आज आपको स्वास्तिक चिन्ह बनाने का गलत और सही दोनों तरीका बताया जाएगा । सबसे पहले गलत तरीका से लोग स्वास्तिक चिन्ह कैसे बनाते हैं यानी कि बहुत से लोग हैं जो स्वास्तिक चिन्ह बनाते हैं तो उनसे बहुत सी गलतियां हो जाती हैं गलतियां आप लोग ना करें इसीलिए यहां आपको पहले गलत तरीका बताया जाएगा
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वीडियो देख स्वास्तिक चिन्ह का –
पहली बात तो यह जानिए कि स्वास्तिक चिन्ह जब भी बनाया जाता हैं तो अनामिका उंगली से बनाया जाता है मतलब यह की अंतिम उंगली जिसे कनिष्ठ कहते हैं कनिष्ठ के बगल वाली उंगली जो है उसे अनामिका उंगली बोलते हैं तो हमेशा स्वास्तिक चिन्ह अनामिका उंगली से ही बनाना चाहिए और स्वास्तिक चिन्ह को बनाते समय हल्दी, कुमकुम या सिंदूर का प्रयोग कर सकते हैं । बहुत से लोग क्या करते की पहले प्लस(+) का चिन्ह बना देते हैं और प्लस चिन्ह बनाने के बाद उसके चारो भुजा को मोड़ देते है और स्वास्तिक बनकर तैयार हो जाता है इस तरह बहुत से लोग हैं जो इस स्वास्तिक चिन्ह को ऐसे बनाते हैं जो तरीका बिल्कुल गलत है यानी कि यह तरीका खंडित माना जाता है । प्लस का चिन्ह बनाने से यह बीच में खंडित हो जायेगा यानी कि स्वास्तिक चिन्ह खंडित नहीं होना चाहिए अब आपको सही तरीका क्या है स्वास्तिक चिन्ह बनाने का उसको बताया जाएगा तो सबसे पहले अनामिका उंगली लेंगे और सबसे पहले बाएं तरफ की भुजा बनाएंगे फिर दाएं तरफ की भुजा बनाएंगे । इस प्रकार से यह सही स्वास्तिक चिन्ह बन जायेगा इस स्वास्तिक चिन्ह से हमारी यह जो चार खंड हैं यह जो चार खंड बिंदु है यह हमारी 4 बिंदु जो हैं धर्म, अर्थ, समृद्धि और मंगल को दर्शाते हैं
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| Swastik chinh |
इस स्वास्तिक चिन्ह की एक खास बात और है वह खास बात यह है कि इस स्वास्तिक चिन्ह को जब आप कहीं देखेंगे तो स्वास्तिक चिन्ह के दोनो तरफ दो–दो भुजाएं होती है उस दोनो भुजाओं को हमेशा नीचे से ऊपर की ओर बनाना चाहिए बहुत से लोग गलती क्या करते हैं कि ऊपर से नीचे की ओर बना देते हैं तो ऊपर से नीचे नहीं बनाना चाहिए जबकि नीचे से ऊपर की ओर यह दो भुजाएं बनानी चाहिए इसी तरह से हम यहां पर भी नीचे से ऊपर की ओर बनाएंगे और आप लोगो ने शायद इसे देखा होगा किसी दुकान पर या कहीं पर भी स्वास्तिक चिन्ह बनाया जाता है तो इसमें दो रेखाएं अलग-अलग होती हैं तो हम लोग यह नहीं समझते हैं कि इस स्वास्तिक चिन्ह में इसका मतलब क्या है तो स्वास्तिक चिन्ह के बाएं तरफ वाली पहली भुजा का मतलब यह है की यह गणेश जी की दो पत्नियों में से एक ‘रिद्धि’ है और दूसरी भुजा रिद्धि के पुत्र ‘शुभ’ हैं और स्वास्तिक चिन्ह के दाएं तरफ वाली दूसरी भुजा ‘सिद्धि’ और पहली भुजा सिद्धि के पुत्र ‘लाभ’ हैं । इसीलिए स्वास्तिक चिन्ह जब भी बनाया जाता है तो उसमें बाएं तरफ शुभ लिखा जाता है और दाहिने तरफ लाभ लिखा जाता है । स्वास्तिक चिन्ह में जो चार बिंदु होता है वह चार बिंदु चार प्रतीक होते है यानी कि अर्थ, धर्म, कर्म और मोक्ष यह चार प्रतीक है ।
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